कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेष्चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥17॥
Translation (HI)
हे योगेश्वर! मैं आपको सदा किस प्रकार ध्यान करके जानूं? और आप किन-किन रूपों में मुझसे चिन्तन योग्य हैं?
Life Lesson (HI)
भक्ति में ध्यान और ज्ञान की गहराई जरूरी है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वह किस प्रकार सदा मुझ योगेश्वर का चिन्तन करके ज्ञान और भक्ति में स्थिर रहे। उन्हें यह पूछने का उद्देश्य है कि उन्हें किन-किन रूपों में सोचना चाहिए और किस प्रकार के ध्यान से उन्हें अधिक लाभ होगा। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान की भक्ति और उनका चिन्तन केवल एक संगीत से विभिन्न चिन्ताओं में प्रवृत्त कर सकते हैं और इससे हमारा जीवन उच्च स्तर पर स्थिर होता है।