अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥42॥
Translation (HI)
हे अर्जुन! इतने सब जानकर भी, क्या तुम्हें और जानने की आवश्यकता है? मैं अपने एक अंश से ही सम्पूर्ण जगत को धारण करता हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर के अंश मात्र से ही संपूर्ण सृष्टि चल रही है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उन्हें सम्पूर्ण जगत को अपने एक अंश से ही स्थित रखने की क्षमता है। उन्होंने अपनी विश्वरूप दर्शन के माध्यम से यह सिद्ध कराया कि उनका अंश सम्पूर्णता में व्याप्त है। इसका मतलब है कि भगवान का सारा विश्व और समस्त सृष्टि उनके एक अंश से ही सृष्टि कार्य कर रहा है।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान एकमात्र सत्य हैं और सभी जीवों के अंश में ही उनकी असीम शक्ति व्यक्त होती है। हमें इससे यह भी समझ मिलता है कि हर एक व्यक्ति में भगवान का अंश है और हम सभी एक ही परमात्मा के अंश हैं। इसके माध्यम से हमें आत्मसम्मान और समर्पण की भावना प्राप्त होती है और हमें समझ में आता है कि सभी जीवों में एकता है। यह श्लोक हमें एकता और समर्पण का महत्व बताता है।