अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥45॥
Translation (HI)
मैं आपके इस पहले कभी न देखे रूप को देखकर आनंदित हूँ, पर मेरा मन भयभीत भी हो गया है। हे देवेश! मुझे कृपा करके वही सौम्य रूप दिखाइए।
Life Lesson (HI)
ईश्वर का सौम्य रूप भक्त के मन को शांति देता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराने के लिए कह रहे हैं। अर्जुन इस पहले कभी न देखे गए दिव्य स्वरूप को देखकर हर्षित होते हैं, परन्तु उनका मन भय से प्रवृत्त हो जाता है। इस भय के कारण भगवान श्रीकृष्ण से अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें दिव्य सौम्य रूप में ही दर्शाएं।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि भगवान का सौम्य रूप भक्त के मन को शांति देता है और उसे भय से मुक्ति दिलाता है। इसके माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर की कृपा और उसका दर्शन हमारे जीवन में आनंद और शांति लाता है। इसलिए भक्त को हमेशा ईश्वर में श्रद्धा रखनी चाहिए और उसके दिव्य रूप का ध्यान करना चाहिए।