जैसे आकाश सर्वत्र होकर भी सूक्ष्मता से लिप्त नहीं होता — वैसे ही आत्मा शरीर में स्थित होते हुए भी लिप्त नहीं होती।
Life Lesson (HI)
आत्मा शरीर में होते हुए भी अकलुष रहती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गीता में आत्मा की अद्भुतता और शुद्धता का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है और उसमें कोई भी लिप्ति नहीं होती, वैसे ही आत्मा भी शरीर में स्थित होते हुए भी उसमें किसी प्रकार की कलुषता या अशुद्धि को नहीं धारण करती। आत्मा हमें अकलुष्ट, अनंत, शुद्ध और अविनाशी रूप से स्वीकार करने की प्रेरणा देती है।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमारी आत्मा हमेशा शुद्ध और निष्कलुष्ट होती है, चाहे जिस भी परिस्थिति में हम रहें। हमें अपने आत्मा की इस अद्भुतता को समझकर उसके द्वारा जीवन को नेतृत्व करना चाहिए। आत्मा का यही निर्विकार स्वरूप हमें जीवन में स्थिरता, शांति और सच्चाई की खोज में मदद करता है।
इस श्लोक का अध्ययन करके हमें यह बोध होता है कि आत्मा हमेशा पवित्र और अमर है, और हमें इस दिव्यता को समझकर अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाना चाहिए।