Bhagavad Gita • Chapter 14 • Verse 19

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Chapter 14 • Verse 19

Gunatraya Vibhaga Yoga

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥19॥
Translation (HI)
जब ज्ञानी व्यक्ति देखता है कि गुणों के सिवा कोई कर्ता नहीं है, और वह इन गुणों से परे मुझे जानता है — तब वह मेरी अवस्था को प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
कर्तापन का भाव ही बंधन है; उसका लोप मोक्ष है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गीता के अर्जुन को बता रहे हैं कि एक ज्ञानी व्यक्ति जब समझता है कि गुणों के सिवा कोई अन्य कर्ता नहीं है, और वह उन गुणों से परे परमात्मा को जान लेता है, तो उसे भगवान की स्थिति को प्राप्त हो जाता है। इस श्लोक से हमें यह समझ मिलता है कि हमारा अहंकार और कर्मफल के बोझ से मुक्त होकर भगवान को पहचानने में हमारी सहायता होती है। कर्म करने में हमें निष्काम भाव से कार्य करना चाहिए और उसका फल भगवान के हाथ में छोड़ देना चाहिए। इस तरह कर्मफल का अभिमान नहीं होगा और हम आत्मा के साथ एकीकृत होकर मुक्ति की प्राप्ति कर सकेंगे। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि कर्मों को करता हुआ भाव छोड़कर भगवान की भक्ति में लग जाना हमें मोक्ष की प्राप्ति में सहायता कर सकता है। इसके द्वारा हमें यह भी बताया गया है कि कर्मफल का अभिमान हमें बंधन में डाल सकता है, जबकि निःस्वार्थ भाव से कर्म करने से हम मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।