श्रीभगवानुवाच। ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥1॥
Translation (HI)
श्रीभगवान ने कहा: ऊपर मूल और नीचे शाखाओं वाला अश्वत्थ वृक्ष कहा गया है, जो अविनाशी है। इसके पत्ते वेद हैं — जो इसे जानता है, वही वेदों का ज्ञाता है।
Life Lesson (HI)
संसार का मूल परमात्मा है, इसकी समझ ही सच्चा ज्ञान है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी महिमा और अनन्तता का उपमेय एक अश्वत्थ वृक्ष के रूप में दर्शाते हैं। यह वृक्ष ऊर्ध्वमूलमधःशाखम, अर्थात् ऊपर का मूल और नीचे की शाखाओं वाला है, और इसे अविनाशी कहा गया है। इस अश्वत्थ वृक्ष के पत्ते वेद के उपासनीय हैं और जो इसे अच्छे से जानता है, वही वेदों का ज्ञाता होता है।
इस श्लोक से हमें यह समझ मिलता है कि परमात्मा ही संसार का मूल है और उसकी समझ ही हमारे जीवन का सच्चा ज्ञान है। हमें चाहिए कि हम भगवान की उपासना में लगे और उनकी समझ के माध्यम से अपने जीवन को धार्मिकता और उच्चता की दिशा में ले जाएं। इसके द्वारा हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ना चाहिए और भगवान की शरण में जाकर उसकी परम्परागत ज्ञान को प्राप्त करना चाहिए।