अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥18॥
Translation (HI)
अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध से युक्त होकर, वे मेरे और दूसरों के शरीरों में बसे आत्मा से द्वेष करते हैं।
Life Lesson (HI)
ईश्वर से द्वेष आत्मा का घोर पतन है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध जैसी दुर्बलताओं से युक्त लोगों को वर्णित कर रहे हैं, जो अपने और दूसरों के शरीर में बसी आत्मा को द्वेष करते हैं। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के अंधकार में आकर जीत नहीं पाता, वह अपनी और दूसरों की आत्मा को अवश्य द्वेष करेगा।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि अहंकार और दुर्बलताओं से परे रहकर हमें सच्चाई और धर्म की ओर अग्रसर होना चाहिए। अहंकार और दुर्बलताओं से मुक्त होकर हमें सच्चे आत्मा की पहचान करनी चाहिए और सभी जीवों में भगवान का दर्शन करना चाहिए। इसके द्वारा हमें यह समझाया जा रहा है कि ईश्वर से द्वेष करना हमारे आत्मा का घातक हो सकता है और हमें इससे बचना चाहिए।