मन की प्रसन्नता, नम्रता, मौन, आत्मसंयम और भावनाओं की शुद्धता — ये मानसिक तप कहलाते हैं।
Life Lesson (HI)
मन की साधना ही आत्मा की शुद्धि का प्रथम चरण है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि मानसिक तप का अर्थ है मन की प्रसन्नता, नम्रता, मौन, आत्मसंयम और भावनाओं की शुद्धता। ये सभी गुण मन की शुद्धि और आत्मा की उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मन की प्रसन्नता और नम्रता से मनःप्रसाद में स्थिति होती है, जो हमें शांति और स्थिरता प्रदान करती है। मौन का अर्थ है वाणी के द्वारा न केवल अच्छा कहना, बल्कि शांति और सामंजस्यपूर्ण विचार करना। आत्मसंयम से हम अपने मन को नियंत्रित करके उसे सकारात्मक दिशा में ले जा सकते हैं। और भावनाओं की शुद्धता से हमारे मन की साफ़ता बढ़ती है और हम परमात्मा के साथ एकीभाव में आ सकते हैं।
इस श्लोक से हमें यह सीखने को मिलता है कि मानसिक तप मानव जीवन में कितना महत्वपूर्ण है। यह हमें अपने मन को निर्मल और पवित्र बनाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है और हमें आत्मा की उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए साहायक होता है।