जो सुख इंद्रियों और विषयों के संपर्क से उत्पन्न होता है और प्रारंभ में अमृत जैसा लगता है, परंतु अंत में विष के समान होता है — वह राजस सुख है।
Life Lesson (HI)
इंद्रियों का सुख अल्पकालिक होता है, उसका अंत कष्टप्रद होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को संसारिक सुख के विषय में बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जो सुख हम इंद्रियों और विषयों के संयोग से प्राप्त करते हैं, वह सुख प्रारंभ में अमृत के समान महसूस होता है। परंतु जैसे विष का स्वाद मीठा लगता है लेकिन बाद में विष ही होता है, ठीक उसी तरह वह सुख राजस सुख कहलाता है जो केवल दिखावटी होता है और अंत में दुःख और असंतोष का कारण बनता है।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि इंद्रियों के संयोग से होने वाला सुख अल्पकालिक होता है और उसका अंत दुःखप्रद होता है। इसलिए हमें इस दुर्लभ मानव जन्म को व्यर्थ न करते हुए अंतर्निहित आनंद की खोज करनी चाहिए जो हमें स्थायी सुख और शांति प्रदान करे।