सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥56॥
Translation (HI)
जो व्यक्ति सदा सभी कर्म करता हुआ भी मुझ पर ही आश्रित रहता है, वह मेरी कृपा से शाश्वत और अविनाशी पद को प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
ईश्वर की शरण में किया गया कर्म मोक्ष का मार्ग बनता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कह रहे हैं कि जो व्यक्ति सब कर्म करता है, लेकिन उसके सभी कर्मों का आधार भगवान पर होता है, वह व्यक्ति उसकी कृपा से शाश्वत और अविनाशी पद को प्राप्त करता है। अर्थात, जब हम सभी कर्मों को भगवान के लिए करते हैं और उनकी शरण में समर्पित रहते हैं, तो हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान की इस कृपा से हम अविनाशी पद को प्राप्त करते हैं जो हमें संसारिक बंधनों से मुक्ति देता है।
इस श्लोक का संदेश है कि हमें अपने सभी कर्मों को भगवान के लिए समर्पित करना चाहिए और उनकी भक्ति में जीना चाहिए। इससे हमें शाश्वत पद, अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होगी। यह हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में यदि हम भगवान के आदेशों का पालन करते हैं और उनकी शरण में रहते हैं, तो हमें संसारिक दुःखों से मुक्ति मिलती है।