सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर युद्ध कर; इस प्रकार तू पाप को प्राप्त नहीं होगा।
Life Lesson (HI)
समत्वभाव से किया गया कर्म पाप से मुक्त करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आर्जुन को समझाते हैं कि सुख और दुःख, लाभ और हानि, जीत और हार सभी को समान भाव से ग्रहण करके युद्ध करना चाहिए। इस भाव से कर्म करने पर व्यक्ति पाप से मुक्त होता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के बारे में बात कर रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य धर्म की रक्षा और सत्य के लिए संघर्ष करना है। यह युद्ध धर्मयुद्ध के संदर्भ में है, जिसमें धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना पाप नहीं है। इस भावना में कर्म करने वाला व्यक्ति पाप से मुक्त होता है और उसके कर्म शुद्ध होते हैं।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि हमें जीवन में सभी स्थितियों को स्वीकार करना चाहिए और उनके साथ संतुलन बनाए रखना चाहिए। जीवन में सुख और दुःख, लाभ और हानि के पल कभी नहीं रुकते हैं, और हमें उनके साथ सहयोग करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। इस तरह के समत्वभाव से किया गया कर्म हमें पाप से मुक्ति दिलाता है और हमें आत्मा के मुक्ति की ओर ले जाता है।