Bhagavad Gita • Chapter 2 • Verse 44

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Chapter 2 • Verse 44

Sankhya Yoga

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥44॥
Translation (HI)
भोग और ऐश्वर्य में आसक्त और whose minds are deluded cannot develop resolute determination for meditation.
Life Lesson (HI)
सच्चे ज्ञान के लिए विषयवासना का क्षय अनिवार्य है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भोग और ऐश्वर्य में आसक्त होने वाले लोगों के लिए उपदेश दे रहे हैं। ऐसे लोगों के मन भ्रमित होते हैं और उनकी बुद्धि में ध्यान के लिए दृढ़ निश्चय नहीं होता। ध्यान के लिए एक निश्चित और स्थिर मानसिक स्थिति की आवश्यकता होती है, जो केवल अपने इन्द्रियों और भोगों में लीन रहने वाले व्यक्तियों के लिए संभव नहीं होती। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि सच्चे ज्ञान और आत्मा के अनुभव के लिए मन का विषयवासना से निवृत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि हम अपने मन को इन्द्रियों के विषयों से मुक्त नहीं करते, तो हमारी बुद्धि में स्थिरता और अवधारणा की क्षमता नहीं आ सकती और हम आत्मा के साक्षात्कार की दिशा में नहीं बढ़ सकते। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि आत्मा के प्रति ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें इन्द्रियों के वश में नहीं रहना चाहिए और विषयवासना से दूर रहकर मन को नियंत्रित करना चाहिए। इससे हम अपनी बुद