विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥71॥
Translation (HI)
जो समस्त कामनाओं का त्याग कर निःस्पृह, निर्मम और निरहंकारी होकर विचरण करता है, वह शांति को प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
त्याग, निरहंकार और निर्ममता से ही शांति मिलती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति सभी कामनाओं को त्यागकर, निःस्पृह (अभावपूर्वक इच्छाओं से रहित), निर्मम (अनासक्त) और निरहंकारी होकर विचरण (चलना) करता है, वह शांति को प्राप्त करता है।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सिखाया जा रहा है कि शांति की प्राप्ति के लिए हमें अपनी सारी मानसिक और भावनात्मक कामनाओं को त्यागना चाहिए। हमें स्वार्थ से दूर रहकर निरहंकार और निर्मम भाव से जीना चाहिए। इसके माध्यम से हम अंतःकरण की शुद्धि और शांति की प्राप्ति कर सकते हैं।
इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि शांति और सुख केवल निर्ममता, निरहंकार और निःस्पृहता से ही प्राप्त हो सकती है। यह गुण एक सच्चे साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जो उसे आनंदमय और उच्च स्थिति में ले जाते हैं। इसलिए, हमें इन गुणों को विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए।