कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥20॥
Translation (HI)
राजा जनक आदि ने भी कर्म करते हुए सिद्धि प्राप्त की थी। इसलिए लोक संग्रह (सामूहिक भलाई) की दृष्टि से भी कर्म करना चाहिए।
Life Lesson (HI)
स्वार्थ से ऊपर उठकर लोककल्याण हेतु कर्म करना श्रेष्ठ है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कर्म का महत्व और उसके सामाजिक परिणामों पर ध्यान देने की प्रेरणा दे रहे हैं। उन्होंने कहा है कि राजा जनक और अन्य योगी भी कर्म करते हुए सिद्धि को प्राप्त कर लिया था, इसलिए हमें भी लोककल्याण के लिए कर्म करना चाहिए।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझने को मिलता है कि कर्म का महत्व है और हमें अपने कर्तव्यों का निर्विघ्न पालन करना चाहिए। भले ही हम अपने स्वार्थ के लिए काम कर सकते हैं, परंतु भलाई के लिए कर्म करना हमारे उच्चतम आदर्शों में से एक होना चाहिए।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने कर्मों को स्वार्थ से परे करके उन्हें समाज के हित में उपयोगी बनाना चाहिए। इससे हम समाज में समर्पित और सहायक बन सकते हैं और समृद्धि की दिशा में योगदान दे सकते हैं।