बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते या बंद करते हुए, वह मानता है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों में संलग्न हैं।
Life Lesson (HI)
आत्मज्ञानी कर्म को अहंकार से नहीं जोड़ता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो मनुष्य इन्द्रियों के द्वारा अपने विषयों में लगा रहता है, वह तदनुसार बोलता है, छोड़ता है, पकड़ता है, आंखें खोलता या बंद करता है, उसे लगता है कि इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों में अटूट रूप से लगी हुई हैं।
इस श्लोक का महत्व यह है कि हमें इन्द्रियों के द्वारा संसार की मोहमयी विषयों में आसक्त नहीं होना चाहिए। अद्वितीय आत्मा को पहचानने वाले व्यक्ति किसी भी क्रिया या इन्द्रिय से जुड़े अहंकार के साथ कर्म नहीं करता। उनका कर्म स्वाध्याय, तपस्या और सेवा के रूप में आत्मा की साधना में होता है। इसके जरिए वे आत्मा के स्वरूप को पहचानते हैं और सम्पूर्ण ब्रह्म में समाहित होते हैं।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें इन्द्रियों के प्रभाव में रहकर उनके वश में आने की जगह, आत्मा के साथ संबंध स्थापित करना चाहिए। यह कर्मयोग के माध्यम से हमें अपने आत्मा की पहचान के मार्ग पर ले जाता है, जिससे ह