श्रीभगवानुवाच। अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥1॥
Translation (HI)
श्रीभगवान ने कहा: जो व्यक्ति कर्मफल की अपेक्षा किए बिना अपना कर्तव्य करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है; केवल अग्नि का त्याग या क्रियाहीनता से वह योगी नहीं बनता।
Life Lesson (HI)
सच्चा त्यागी वह है जो कर्म करता हुआ भी फल की आसक्ति नहीं रखता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि जो व्यक्ति कर्मफल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी होता है। यहाँ 'अनाश्रितः' शब्द से यह बोध होता है कि कर्मफल में आसक्ति न होने पर ही व्यक्ति असली संन्यासी और योगी होता है। बस केवल अग्नि का त्याग या क्रियाहीनता से योगी नहीं बना जा सकता।
इस श्लोक का महत्व यह है कि हमें कर्म करना चाहिए लेकिन कर्मफल की चिंता नहीं करनी चाहिए। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन करना चाहिए और कर्मफल में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। इसके माध्यम से हम समझते हैं कि असली संन्यास या योग स्वार्थ से परे होता है और यह हमें मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।