जैसे निर्बाध वायु में दीपक नहीं डोलता, वैसा ही उदाहरण उस योगी के चित्त का है जो आत्मा में स्थित है।
Life Lesson (HI)
स्थिरता ही ध्यान की सफलता की कसौटी है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण योगी की ध्यानाभ्यास को एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हैं। जैसे कि एक दीपक जो वायु में स्थिर रूप से जलता है और नहीं हिलता, उसी प्रकार एक योगी भी अपने मन को स्थिर रखकर आत्मा में ध्यान लगाता है। जिस तरह दीपक के जलने को वायु की प्रेरणा की आवश्यकता होती है, उसी तरह योगी के लिए भी मन को संयमित करने के लिए योगाभ्यास की आवश्यकता है।
इस श्लोक का महत्वपूर्ण सन्देश है कि स्थिरता और मनोनिग्रह ध्यान की सफलता की कुंजी है। योगी को अपने मन को विचारों की उन्माद से दूर रखकर आत्मा के साथ एकीभाव में लगना चाहिए। योगी को अपने मन को नियंत्रित करने के माध्यम से अपनी आत्मा को पहचानना चाहिए और उससे जुड़कर आत्मा में स्थिति प्राप्त करनी चाहिए। इस तरह का ध्यान और साधना करने वाले योगी को समग्र जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि मिलती है।