सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥21॥
Translation (HI)
जो सुख अत्यंत है, जो इन्द्रियों से परे है और केवल बुद्धि द्वारा अनुभव होता है — वह जहाँ योगी को प्राप्त होता है और जहाँ से वह विचलित नहीं होता।
Life Lesson (HI)
अन्तरात्मा में स्थित परम सुख ही सच्चा सुख है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण योगी को उस सुख के बारे में बता रहे हैं जो अत्यंत है, जो इंद्रियों से परे है और केवल बुद्धि द्वारा अनुभव किया जा सकता है। यह सुख जो अन्तरात्मा में स्थित है, वह एकमात्र सच्चा सुख है जो हमें अनंत और अविच्छेद्य आनंद का अनुभव कराता है। इस सुख को प्राप्त करने के लिए हमें अपनी इंद्रियों के प्रति निग्रह रखना और बुद्धि के माध्यम से अंतरात्मा की ओर ध्यान देना होता है। यह सुख हमें आत्मा के अमिट शांति और आनंद का अनुभव कराता है। इस सुख को प्राप्त करने से हम सांसारिक सुखों की होड़ से मुक्त होकर अनंत आनंद का अनुभव कर सकते हैं। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि असली सुख अंतरात्मा में हमें प्राप्त होता है और इंद्रियों के विषयों में मोहित होकर हम सच्चे सुख को प्राप्त नहीं कर सकते।