जिस योगी का मन शांत है, जिसका रजोगुण समाप्त हो गया है, जो ब्रह्म में स्थित है और निष्पाप है — वह श्रेष्ठ सुख को प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
शांति, निष्कलंकता और ब्रह्मभाव — यही योग का फल है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में कहा गया है कि जो योगी अपने मन को प्रशान्त और शांत रखता है, जिसका रजोगुण (राग-द्वेष की प्रवृत्ति) समाप्त हो गया है, जो ब्रह्म में स्थित है और निष्पाप है, वह उत्तम सुख को प्राप्त करता है।
इस श्लोक में यह बताया गया है कि योगी को अपने मन को वश में रखना चाहिए, उसे अपने अंतःकरण को शांति में रखना आनीवाला सुख की प्राप्ति का मार्ग है। जब योगी अपने अंतःकरण को निर्मल और निष्कलंक बनाता है, तो वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है जिससे उसे उच्च स्थिति की प्राप्ति होती है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि योगी को मन को नियंत्रित रखना और अपने अंतःकरण को शांति में रखना चाहिए ताकि उसे उच्च सुख की प्राप्ति हो सके। इस तरह श्रेष्ठ सुख का साधन करना उसका प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए।