सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥29॥
Translation (HI)
योगयुक्त आत्मा वाला व्यक्ति सब प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है — वह सब में समदृष्टि रखता है।
Life Lesson (HI)
योग का चरम बिंदु है — समभाव और एकत्व की दृष्टि।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान योगयुक्त आत्मा वाले व्यक्ति के विषय में बता रहे हैं। योगयुक्त आत्मा वाला व्यक्ति वह है जो योग (एकाग्रता और संयम) में स्थिर रहकर सभी प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है। उसकी दृष्टि सभी में समान होती है, उसे सबका समान दर्शन होता है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें सभी प्राणियों के प्रति समान भाव और समभाव रखना चाहिए। यह हमें एकत्व और सामर्थ्य की दृष्टि से जीवन जीने की महत्वपूर्णता बताता है। इस श्लोक का संदेश है कि योग का सबसे उच्च लक्ष्य समभाव और एकत्व की दृष्टि में स्थित रहकर सभी प्राणियों के प्रति समर्पित भाव रखना है।