असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥36॥
Translation (HI)
जिसका आत्मा वश में नहीं है, उसके लिए योग प्राप्त करना कठिन है; परंतु संयमित आत्मा वाला पुरुष प्रयासपूर्वक योग को प्राप्त कर सकता है।
Life Lesson (HI)
संयम से ही योग प्राप्त होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह समझाने के लिए कह रहे हैं कि जो व्यक्ति अपने मन को वश में नहीं कर पाता, उसके लिए योग को प्राप्त करना अत्यधिक कठिन है। वह व्यक्ति जो अपने मन को वश में करके संयमित रहता है, वह पुरुष प्रयत्नपूर्वक योग को प्राप्त कर सकता है।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण हमें संयम (आत्मा के वश में रखना) के महत्व की बात कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि योग को प्राप्त करने के लिए मन को वश में रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि अपने मन को नियंत्रित करके ही हम योग को प्राप्त कर सकते हैं। इसका मतलब है कि मन की व्यवस्था और संयम हमारे योग की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि संयम और आत्मनिग्रह के माध्यम से ही हम योग को प्राप्त कर सकते हैं।