जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥7॥
Translation (HI)
जिसका आत्मा वश में और शांत है, उसके लिए परमात्मा समभाव से स्थित होता है — चाहे वह शीत या उष्ण, सुख या दुःख, मान या अपमान में हो।
Life Lesson (HI)
जो भीतर से शांत है, वही परमात्मा को समान रूप में देख सकता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति अपने मन को जीतकर शांत और स्थिर है, उसके लिए परमात्मा सर्वत्र समान रूप से वर्तमान होता है। वह व्यक्ति चाहे शीत हो या उष्ण, सुख हो या दुःख, मान हो या अपमान, उसके मन की स्थिति परमात्मा के साथ समान होती है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि अपने मन को जीतकर शांत रखना हमें परमात्मा के साथ संयोग स्थापित करने में मदद करता है। जब हम अपने मन को नियंत्रित करते हैं, तो हम स्थिरता और शांति की स्थिति में रहते हैं और फिर हमें जो भी परिस्थितियाँ आती हैं, हम उनसे सहजता से निपट सकते हैं। इस तरह, यह श्लोक हमें मन की सामर्थ्य और नियंत्रण की महत्वपूर्णता को समझाता है जो हमें परमात्मा के साथ संयोग बनाए रखने में मदद करता है।