ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥12॥
Translation (HI)
सत्त्व, रज और तम — ये सभी भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। परंतु मैं उनमें नहीं रहता, वे मुझमें रहते हैं।
Life Lesson (HI)
त्रिगुणों से ऊपर उठकर ही ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि सत्त्व, रज और तम — तीनों गुण जो हमारे भावों और क्रियाओं को प्रभावित करते हैं, वे सभी मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। यह तात्पर्य है कि जो भी भाव या क्रिया हम करते हैं, वे तीनों गुणों के प्रभाव में होते हैं, परंतु भगवान उनमें से अलग रहते हैं। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें तीनों गुणों से परे उठकर ईश्वर के साक्षात्कार की ओर बढ़ना चाहिए।
भगवान कहते हैं कि त्रिगुणों के बाह्य प्रभावों से ऊपर उठकर ही हम अपने आत्मा को स्वरूप से जान सकते हैं और ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते हैं। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि हमें तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त होकर अपने आत्मा में वास्तविक सुख और शांति की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।