इंद्रियों को संपूर्ण रूप से संयमित करके, मन को हृदय में और प्राण को मस्तक में स्थित कर, जो योगधारण में स्थित होता है —
Life Lesson (HI)
योग की अंतिम स्थिति शरीर के नियंत्रण और आत्मा की स्थिति का संयोजन है।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के आध्यात्मिक गुरु श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को योग के महत्व और उसके साधनों के बारे में बोधित करने के लिए कहा गया है। यहां योग के उच्च स्तर का वर्णन किया गया है जो वास्तविक योगी कैसा होना चाहिए उसे समझाता है।
इस श्लोक में कहा गया है कि योगी को अपने सभी इंद्रियों को संयमित रखना चाहिए, उनका मन अपने हृदय में स्थित रखना चाहिए और अपने प्राण को मस्तक में स्थानित करना चाहिए। इस प्रकार, योगी को अपने शरीर, मन और आत्मा के संयोजन के माध्यम से योग की साधना करनी चाहिए।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि योग का सच्चा अर्थ शरीर, मन और आत्मा के संयोजन में है। योग का सर्वोच्च उद्देश्य है अपने इंद्रियों और मन को नियंत्रित करके आत्मा के साथ एकीभाव में रहना। इससे हम अपने जीवन को संतुलित और शांत बना सकते हैं और अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल हो सकते हैं।