नागों में मैं अनन्त हूँ, जलचरों में वरुण, पितरों में अर्यमा और संयम करने वालों में यमराज हूँ।
Life Lesson (HI)
न्याय, संयम और संरक्षण — तीनों में ईश्वर की उपस्थिति है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी महिमा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि वे सभी विषयों और उनकी प्राधान्यता को आत्मसात् के माध्यम से दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे नागों के अनंत स्वरूप हैं, जलचरों में वरुण के समान, पितरों में अर्यमा के रूप में और संयम करने वालों में यमराज के समान हैं।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर सभी वस्तुओं में उपस्थित हैं और सभी वस्तुएं उनके अभिन्न रूप हैं। वे समस्त संविधान की संरक्षक हैं और संयम और न्याय के सिद्धांतों के पालन का भाव रखते हैं। इस श्लोक से हमें यह भी समझने को मिलता है कि हमें सभी विषयों को ईश्वर के रूप में स्वीकार करना चाहिए और सभी कार्यों में न्याय, संयम और संरक्षण की भावना रखनी चाहिए।