न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर् न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥48॥
Translation (HI)
हे कुरुप्रवीर! न वेद, यज्ञ, अध्ययन, दान, कर्म, और न ही कठोर तप से — इस प्रकार के रूप को कोई अन्य नहीं देख सकता।
Life Lesson (HI)
ईश्वर की विशेष अनुभूति योग, भक्ति और कृपा से ही संभव है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वेदों का अध्ययन, यज्ञ, दान, कर्म और कठोर तपस्या से भी जो अनुभव मैं दिखाऊंगा, वह किसी और द्वारा नहीं देखा जा सकता। इस प्रकार की अनुभूति मानव जीवन में अत्यंत अद्वितीय और अद्वितीय है। यहाँ भगवान कह रहे हैं कि इस अनुभव को देखने के लिए कोई और साधक नहीं हो सकता, केवल भगवान के कृपा, भक्ति और योग से ही यह अनुभव संभव है। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान की साक्षात्कार के लिए हमें भक्ति और योग के माध्यम से उनकी अनुभूति करनी चाहिए।