Bhagavad Gita • Chapter 12 • Verse 13

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Chapter 12 • Verse 13

Bhakti Yoga

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥13॥
Translation (HI)
जो सभी प्राणियों से द्वेष रहित, मित्रवत, दयालु, ममत्व और अहंकार रहित, सुख-दुख में सम और क्षमाशील है—
Life Lesson (HI)
भक्त का मन प्रेम, दया और समता से भरा होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति की महत्वपूर्ण गुणों का वर्णन कर रहे हैं। भक्त को स्वयं को सभी प्राणियों के प्रति द्वेष रहित और सच्चे मैत्रीभाव से युक्त रहना चाहिए। वह दयालु होना चाहिए और अपने स्वार्थ की भावना से रहित रहना चाहिए। सुख और दुःख में समानभाव रखने वाला होना चाहिए और सभी को क्षमा करने की योग्यता रखना चाहिए। इस श्लोक का सारांश है कि भक्त जो भगवान के प्रति प्रेम, दया और समता से भरा हुआ है, वह सच्चे भक्ति का ही होता है। इसका संदेश है कि हमें सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और समर्पण रखना चाहिए और दयालुता और क्षमा के साथ जीना चाहिए। इससे हम भगवान के प्रति सच्ची भक्ति का अनुभव कर सकते हैं और उसकी कृपा को प्राप्त कर सकते हैं।