सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥14॥
Translation (HI)
जो सदा संतुष्ट, आत्मनियंता, दृढ़ निश्चयी, और जिसकी बुद्धि व मन मुझमें समर्पित है — वह भक्त मुझे प्रिय है।
Life Lesson (HI)
सच्चा भक्त भीतर से संतुष्ट और स्थिर रहता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति के महत्व को बताते हैं। एक सच्चा भक्त उस योगी का नाम प्राप्त करता है, जिसकी आत्मा सदा संतुष्ट और निश्चयी होती है। उसकी मन और बुद्धि में ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण होता है। ऐसा भक्त भगवान के प्रिय होता है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि भक्ति के माध्यम से हमें ईश्वर के साथ एक संबंध स्थापित करना चाहिए और उसके प्रति पूर्ण समर्पण और आत्मनिर्भरता बनाए रखना चाहिए। इससे हमारा मन संतुष्ट रहेगा और हम जीवन में स्थिरता और आनंद पा सकेंगे।