Bhagavad Gita • Chapter 12 • Verse 15

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Chapter 12 • Verse 15

Bhakti Yoga

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥15॥
Translation (HI)
जो न तो किसी को विचलित करता है और न स्वयं विचलित होता है — हर्ष, ईर्ष्या, भय और तनाव से मुक्त रहता है — वह मुझे प्रिय है।
Life Lesson (HI)
जो स्वयं शांत है वही संसार को शांति दे सकता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति किसी भी प्रकार से परेशान नहीं होता और न ही दूसरों को परेशान करता है, वह उनके लिए प्रिय है। जो व्यक्ति हर्ष, ईर्ष्या, भय और तनाव से मुक्त रहता है, वह भगवान के लिए प्रिय है। इस श्लोक का जीवन संदेश है कि हमें स्थिर और शांत रहकर अपने आपको और अपने आसपास के लोगों को सुखी रखना चाहिए। एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी भावनाओं और मनोबल को नियंत्रित करके सभी स्थितियों में स्थिर और संतुलित रहता है, वह दूसरों को भी प्रेरित करता है और समाज में शांति और सुख का संदेश फैलाता है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें अपने भावनाओं को नियंत्रित रखना चाहिए और जीवन में स्थिरता और शांति का मार्ग चुनना चाहिए। इससे हम अपने आसपास के लोगों के साथ अच्छे संबंध बना सकते हैं और समृद्धि और सुख की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं।