जो निंदा-स्तुति में समान, मौन, जैसे भी मिले उसमें संतुष्ट, निराश्रित और स्थिर बुद्धि वाला है — वह भक्त मुझे प्रिय है।
Life Lesson (HI)
ईश्वर को प्रिय भक्त वह है जो बाहरी स्थितियों से परे हो।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के आध्यात्मिक ज्ञान का महत्वपूर्ण संदेश देता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त के गुणों का वर्णन कर रहे हैं।
इस श्लोक में कहा गया है कि ईश्वर को प्रिय भक्त वह है जो जैसे भी स्थितियों में हो, वह समान निंदा और स्तुति के संदर्भ में रहता है, मौन रहता है, संतुष्ट रहता है, निराश्रित होता है और स्थिर बुद्धि वाला होता है।
भगवद गीता के इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि एक सच्चा भक्त वह होता है जो भगवान के प्रति निःस्वार्थ भक्ति और समर्पण रखता है। उसे जो कुछ भी मिले, उसमें संतुष्ट रहना और स्थिर बुद्धि से कर्म करना चाहिए। इस रीति से वह भगवान के प्रिय होता है।
इस भावार्थ से हमें यह समझ मिलता है कि भक्ति का मार्ग केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भरता, संतुष्टि और समर्पण की भावना से भरा होना चाहिए। इस प्रकार का भक्ति वास्तविक भक्ति है जो हमें ईश्वर के साथ एकात्मता में ले जाती है।