ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्धधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥20॥
Translation (HI)
जो इस धर्ममय अमृत को श्रद्धा से मेरे परायण होकर ग्रहण करते हैं — वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
Life Lesson (HI)
श्रद्धा और समर्पण से युक्त भक्ति ही ईश्वर को प्रिय है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इस धर्ममय अमृत को श्रद्धा और समर्पण से ग्रहण करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं। यहाँ 'धर्म्यामृत' का अर्थ है वह अमृत जो धर्म से युक्त है। जिस प्रकार अमृत शरीर को नष्ट करने वाला है, उसी प्रकार धर्म्यामृत भी संसारिक दुःखों को नष्ट करने वाला है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि भगवान को प्रिय बनाने का सबसे सरल तरीका श्रद्धा और समर्पण से भक्ति में लगना है। भगवान को चाहने वाले भक्त को उसकी श्रद्धा के आधार पर ही भगवान की प्रियता प्राप्त होती है। इसलिए, हमें भगवान की प्राप्ति के लिए श्रद्धा और समर्पण से भक्ति का अभ्यास करना चाहिए।