इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥19॥
Translation (HI)
इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन हुआ। मेरा भक्त इसे जानकर मेरी स्थिति को प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
सच्चे ज्ञान से भक्त परम अवस्था को प्राप्त करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपने भक्तों को यह बताते हैं कि क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय के विषय में संक्षेप में वर्णन किया गया है। यहाँ 'क्षेत्र' शरीर को दर्शाता है, 'ज्ञान' ज्ञान की प्राप्ति के उपायों का उल्लेख करता है और 'ज्ञेय' आत्मा को स्थानित करता है। इसका अर्थ है कि जो भक्त मेरे क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को जान लेता है, वह मेरी स्थिति को प्राप्त करता है और मेरे साथ हमेशा रहता है।
इस भावार्थ के माध्यम से हमें यह समझ मिलता है कि सच्चे ज्ञान के माध्यम से हम भगवान की प्रीति में स्थिर रह सकते हैं और उसके साथ एकात्मता में जीवन यापन कर सकते हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि भगवान के प्रति भक्ति और ज्ञान दोनों ही हमें उनके साथ जुड़ने में सहायक हो सकते हैं और उसकी परमानन्द को प्राप्त करने में सहायक हो सकते हैं।