कार्य-कारण के कर्तृत्व का कारण प्रकृति है; और सुख-दुःख के भोक्ता के रूप में पुरुष (आत्मा) कारण है।
Life Lesson (HI)
संसार की क्रियाओं का संचालन प्रकृति करती है, पर आत्मा उसका अनुभव करती है।
Commentary (HI)
श्लोक 21 में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा बताया जा रहा है कि कार्य-कारण के कार्तृत्व का कारण प्रकृति है, जो संसारी जीवों के कर्मों को संचालित करती है। और सुख-दुःख के भोक्ता के रूप में पुरुष (आत्मा) है, जो उस कर्म का अनुभव करता है।
इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि हमारे जीवन में हो रहे सभी कार्यों और उनके परिणामों का जिम्मेदार कारण प्रकृति होती है, जो हमारे कर्मों को नियंत्रित करती है। वहाँ इस प्रकार, हमें अपने कर्मों के फल को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि आत्मा ही उसका अनुभव करती है, और इसका उद्देश्य हमें अध्यात्मिक उन्नति की दिशा में ले जाना चाहिए।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें स्वीकार करना चाहिए कि हमारे कर्मों के परिणाम हमें अनुभव करने पड़ेंगे, और हमें इस अनुभव से सीखना चाहिए और उसे अच्छे मार्ग पर ले जाना चाहिए। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह भी याद दिलाया जाता है कि हमें अपने कर्मों को उचित रीति से करना चाहिए औ