Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 22

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Chapter 13 • Verse 22

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥22॥
Translation (HI)
प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति के गुणों को भोगता है; गुणों के संग से ही वह शुभ और अशुभ जन्मों को प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
गुणों से आसक्ति ही जन्मों का कारण बनती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि पुरुष यानी मनुष्य जीवन में दुःख और सुख को प्राप्त करता है उसके अनुसार उसके गुणों के आधार पर। पुरुष जो है वह प्रकृति में स्थित रहकर प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तम) का अनुभव करता है। इन गुणों के समावेश से ही वह अच्छे या बुरे जन्मों का अनुभव करता है। इस भावार्थ में यह बताया गया है कि जीवन में आसक्ति और मोह के कारण ही हम अलग-अलग प्रकार के जन्मों को प्राप्त करते हैं। गुणों से आसक्ति होने पर हमारा विचार और कर्म उसी दिशा में जाता है और हम उसी प्रकार के जन्मों का अनुभव करते हैं। इसलिए, गुणों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए हमें आत्मनिरीक्षण और साधना का मार्ग अपनाना चाहिए। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें अपने कर्मों और आचरण को संवेदनशीलता से देखना चाहिए और गुणों के प्रभाव से मुक्त होकर अपने जीवन को एक उच्च स्तर पर ले जाना चाहिए।