प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥30॥
Translation (HI)
जो जानता है कि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, और आत्मा कर्ता नहीं है — वही वास्तव में देखता है।
Life Lesson (HI)
अहंकार त्याग कर कर्म करना मुक्त करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण जी समझाते हैं कि हमारे कर्म और क्रियाएँ प्रकृति के गुणों द्वारा होती हैं, और हमारी आत्मा इसमें कर्ता नहीं है। यदि हम इस सत्य को समझ लेते हैं और इस अहंकार को त्याग देते हैं, तो हम वास्तव में सच्चाई को देख पाते हैं।
इस भावना को समझने के लिए हमें अपने अहंकार को छोड़ना और सभी कर्मों को निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए। अहंकार का त्याग करने से हमें मुक्ति मिलती है और हम सच्चाई को स्पष्टता से देख सकते हैं। इस श्लोक का जीवन संदेश है कि हमें अहंकार और अभिमान को त्याग करके निःस्वार्थ भाव से कर्म करना चाहिए ताकि हम अपने आत्मा को स्वतंत्र और शुद्ध बना सकें।