मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥25॥
Translation (HI)
जो मान-अपमान, मित्र-शत्रु और सभी प्रारंभों (कर्मों) को त्यागकर सम रहता है — वही गुणातीत कहलाता है।
Life Lesson (HI)
गुणातीत वही होता है जो राग-द्वेष और कर्म के बंधनों से मुक्त हो।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन को यह सिखाते हैं कि एक व्यक्ति को समस्त स्थितियों में समान भाव रखना चाहिए। चाहे वह मान-अपमान, मित्र-शत्रु या किसी भी कर्म का हो। जो व्यक्ति सभी प्रारंभों को त्यागकर उसके पीछे छुपे राग-द्वेष को भी दूर कर देता है, वह गुणातीत कहलाता है।
इस श्लोक की महत्वपूर्ण शिक्षा है कि व्यक्ति को अपने भावों और भाग्य से परे स्थिति में रहना चाहिए। राग-द्वेष के प्रभाव से मुक्त होकर जीवन को साहस, समर्पण और समता के साथ जीना चाहिए। इसके माध्यम से हम सच्चे गुणातीत और उच्च स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में समर्पण, समता और त्याग की महत्वपूर्णता है जो हमें गुणातीत बनने की मार्गदर्शि करता है।