जो सुख-दुख में सम है, जो मिट्टी, पत्थर और सोने को एक समान मानता है, प्रिय और अप्रिय में समभाव रखता है, और निन्दा-स्तुति में भी समान रहता है — वही धीर है।
Life Lesson (HI)
समत्व ही योग की सबसे ऊँची अवस्था है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण धीरता की महत्वपूर्णता को बता रहे हैं। धीरता का अर्थ है जो व्यक्ति सुख और दुख, लाभ और हानि, प्रिय और अप्रिय को समान दृष्टि से देखता है। वह व्यक्ति जो समान भाव से स्थिति का सामना करता है, वही धीर है। वह व्यक्ति जो स्थिति की प्रतिक्रिया में स्थिर रहता है, उसे धीर कहा जाता है।
धीरता से आध्यात्मिक उन्नति की ओर पहुंचने का मार्ग है। यह श्लोक समता और सहिष्णुता की महत्वपूर्णता को साबित करता है, जो कि योग के मार्ग की उच्चतम अवस्था है। धीरता के माध्यम से हम सार्वभौमिक भाव से जीवन को देख सकते हैं और समस्त मानवता में समर्पित हो सकते हैं।
इस श्लोक द्वारा शिक्षा दी जा रही है कि हमें सभी परिस्थितियों में स्थिर रहना चाहिए और समत्व और समरसता का भाव बनाए रखना चाहिए। यह हमें अधिक समझदार, सजग और उदार बनाता है जो जीवन में सफलता की दिशा में हमें आगे बढ़ने में मदद कर सकता है।