हे कौन्तेय! रजोगुण को रागयुक्त समझो — यह तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है और कर्मों के बंधन से आत्मा को बाँधता है।
Life Lesson (HI)
रजोगुण कर्म में लगाकर चक्र में उलझा देता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि रजोगुण को रागयुक्त समझना चाहिए। रजोगुण तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है, जो हमें कर्मों के बंधन में फंसा देता है। इस गुण का प्रभाव हमारे चित्त पर भी पड़ता है और हमें वासनाओं में उलझा देता है। यह गुण हमें भौतिक और मानसिक तौर पर आवश्यक संतुलन की ओर नहीं ले जाता है, बल्कि हमें अनिश्चितता और मोह में डाल देता है।
इस श्लोक से हमें यह सीखने को मिलता है कि हमें अपने कर्मों में रागद्वेष की भावना से दूर रहना चाहिए। यह हमें अपने आत्मविकास और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करेगा। इसके बजाय, हमें निष्काम कर्म करना चाहिए और आत्मानुसंधान के मार्ग पर चलना चाहिए। इस प्रकार, हम अपने कर्मों के माध्यम से आत्मा की उन्नति में सहायता कर सकते हैं और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकते हैं।