यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥18॥
Translation (HI)
क्योंकि मैं क्षर और अक्षर दोनों से परे हूँ, इसलिए मैं संसार में और वेदों में पुरुषोत्तम के रूप में प्रसिद्ध हूँ।
Life Lesson (HI)
परमेश्वर ही पुरुषोत्तम है — सबसे श्रेष्ठ।
Commentary (HI)
श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि वे क्षर (यानी अस्थायी, नाशवान) और अक्षर (यानी अविनाशी, शाश्वत) दोनों से परे हैं। इसलिए उन्हें लोक में और वेदों में पुरुषोत्तम के रूप में प्रसिद्ध जाना जाता है। यह श्लोक भगवान की अद्भुत प्राचीनता और उनकी अद्वितीयता को प्रकट करता है।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि भगवान ही सर्वोत्तम हैं और उनका स्वरूप सबसे अद्वितीय और अमिट है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि भगवान का स्वरूप अत्यंत उच्च और अद्वितीय होता है, जिससे वे सबकुछ कर सकते हैं और जिनकी शक्ति अनंत और अविरल है। इसलिए, हमें भगवान के प्रति निष्ठा और श्रद्धा रखनी चाहिए ताकि हम उनके अमिट गुणों का आनंद उठा सकें और उनके चरणों में शरण ले सकें।