जब परमात्मा शरीर ग्रहण करता है या त्यागता है, तो वह इन्द्रियों को मन सहित अपने साथ ले जाता है, जैसे वायु सुगंध को ले जाती है।
Life Lesson (HI)
आत्मा शरीर बदलती है, पर उसकी स्मृति और प्रवृत्ति साथ रहती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जी भगवान की अद्वितीय स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। यहाँ कहा गया है कि जैसे वायु अपने साथ गंध को ले जाती है, ठंडी या गर्मी को नहीं। इसी तरह जब परमात्मा शरीर को प्राप्त होता है या छोड़ता है, तो वह सिर्फ इन्द्रियों को मन के साथ ले जाता है, न कि उसके साथ संबंधित भोग या दुख। यह आत्मा का स्वरूप है कि वह शरीर में अविनाशी है और उसके अतीत और भविष्य की स्मृति और प्रवृत्ति साथ रहती है। इस भावना के साथ हमें यह समझना चाहिए कि हम अन्तर्यामी परमात्मा के साथ हमेशा जुड़े रहते हैं, और हमारे कर्मों का फल हमेशा हमारे साथ रहता है। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने कर्मों को सावधानी से चुनना चाहिए और अपने आत्मा के महत्व को समझना चाहिए।