श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥9॥
Translation (HI)
यह आत्मा कान, आंख, त्वचा, जिह्वा और नाक, तथा मन के द्वारा इन्द्रिय विषयों का अनुभव करता है।
Life Lesson (HI)
इन्द्रियों के द्वारा आत्मा विषयों का अनुभव करती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण आत्मा की विविधता को समझाते हुए कहते हैं कि यह आत्मा कान, आंख, त्वचा, जिह्वा और नाक, तथा मन के द्वारा इन्द्रियों के विषयों का अनुभव करती है। यह आत्मा इन्द्रियों के माध्यम से भौतिक और मानसिक विषयों को जानकरी और अनुभव करती है।
जीवन संदेश:
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझाया जाता है कि हमारी आत्मा इन्द्रियों के माध्यम से इस संसार को अनुभव करती है। हमें यह समझना चाहिए कि इंद्रियों के द्वारा हमें प्राप्त होने वाली ज्ञान और सुख अस्थायी हैं और अनंत आनंद केवल आत्मा में ही स्थित है। इसलिए, इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने इंद्रियों को नियंत्रित करके आत्मा की अद्वितीय स्वरूप को समझना चाहिए और सच्चे आनंद की ओर प्राप्ति करनी चाहिए।