Bhagavad Gita • Chapter 15 • Verse 10

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Chapter 15 • Verse 10

Purushottama Yoga

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥10॥
Translation (HI)
मूढ़ लोग आत्मा को शरीर से निकलते, उसमें स्थित या विषयों का अनुभव करते नहीं देख पाते — पर ज्ञानीजन उसे ज्ञानचक्षु से देखते हैं।
Life Lesson (HI)
आत्मा को जानना ज्ञानचक्षु से ही संभव है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवद गीता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण हमें बता रहे हैं कि मूढ़ लोग आत्मा को शरीर से अलग होते हुए या उसमें स्थित या विषयों का अनुभव करते हुए नहीं देख पाते। उनकी बुद्धि इस सत्य को समझने में अज्ञानी होती है। वे आत्मा की सच्चाई को नहीं समझ पाते। विपरीत, ज्ञानी लोग आत्मा को उसकी सच्चाई से देखते हैं। उन्होंने अपनी बुद्धि को इस सत्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया है और वे ज्ञान की दृष्टि से आत्मा को समझते हैं। ज्ञानी व्यक्ति आत्मा के असली स्वरूप को समझकर उसके साथ एकीकृत हो जाते हैं। इस श्लोक का जीवन संदेश है कि आत्मा को समझने के लिए हमें ज्ञान और विवेक की दृष्टि से देखना चाहिए। सत्य को समझने के लिए हमें अपनी बुद्धि को उचित दिशा में ले जाना चाहिए और आत्मा के असली स्वरूप को समझने के लिए ज्ञानचक्षु से देखना चाहिए। इससे हम अपने जीवन में संगीत, सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति कर सकते हैं।