Bhagavad Gita • Chapter 16 • Verse 1

Read the shloka, translation, commentary, and tags.

Chapter 16 • Verse 1

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

श्रीभगवानुवाच। अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥1॥
Translation (HI)
भगवान ने कहा: अभय, मन की पवित्रता, ज्ञानयोग में स्थित होना, दान, इन्द्रिय-निग्रह, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये दिव्य गुण हैं।
Life Lesson (HI)
दिव्यता की शुरुआत भयमुक्त, संयमित और ज्ञानयुक्त जीवन से होती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य गुणों के बारे में समझा रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अभय, मन की पवित्रता, ज्ञानयोग में स्थित होना, दान, इन्द्रिय-निग्रह, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता ये सभी दिव्य गुण हैं। यहाँ 'अभय' का अर्थ है भयरहित होना, 'सत्त्वसंशुद्धि' का अर्थ है मन की शुद्धि, 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' का अर्थ है ज्ञानयोग में स्थित रहना। इसका शिक्षात्मक संदेश है कि हमें धार्मिक गुणों को अपने जीवन में अंकित करना चाहिए ताकि हम दिव्यता की ओर अग्रसर हो सकें। यह श्लोक हमें यह बताता है कि दिव्यता के लक्षण भयमुक्त, संयमित और ज्ञानयुक्त जीवन से होते हैं। इसका मतलब है कि हमें अपने जीवन में भय को हरना, अपने मन को शुद्ध रखना, ज्ञान और आत्मविश्वास में स्थित रहना और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। इससे हम अपने आत्मा को उच्चतम दिव्य स्थिति में ले जा सकते हैं।