Bhagavad Gita • Chapter 16 • Verse 9

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Chapter 16 • Verse 9

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥9॥
Translation (HI)
ऐसे दृष्टिकोण को पकड़कर, ये नष्ट आत्मा वाले, अल्पबुद्धि वाले, उग्र कर्मों में प्रवृत्त होते हैं — संसार के विनाश हेतु।
Life Lesson (HI)
अधार्मिक विचार अंततः समाज और आत्मा दोनों को विनाश की ओर ले जाते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उस दृष्टिकोण की चर्चा कर रहे हैं जिसे पकड़कर नष्ट आत्मा वाले, अल्पबुद्धि वाले लोग उग्र कर्मों में लिप्त हो जाते हैं। ये लोग अधार्मिक क्रियाओं में व्यस्त रहकर समाज और आत्मा दोनों को हानि पहुँचाने के लिए कार्यरत होते हैं। इनकी अल्पबुद्धि उन्हें सही और उचित कर्मों की पहचान करने से वंचित रखती है, और इससे उनके आत्मा का विकास रुक जाता है। ऐसे लोग अपने अहंकार और अज्ञान की गहरी अंधकार में डूबे रहते हैं और उग्र कर्मों के द्वारा अपने आत्मा को नष्ट करते हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखने को मिलता है कि हमें सही दृष्टिकोण बनाए रखना चाहिए, और अधार्मिक क्रियाओं से बचकर सही और उचित कर्मों में लगना चाहिए ताकि हमारी आत्मा का विकास हो सके और हम समाज और आत्मा दोनों को हानि से बचा सकें।