भगवान ने कहा: शरीरधारियों की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विक, राजसिक और तामसिक — जो स्वभाव से उत्पन्न होती है। सुनो उसे।
Life Lesson (HI)
स्वभाव के अनुरूप ही श्रद्धा का प्रकार होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि शरीरधारियों की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। यह श्रद्धा उनके स्वभाव से उत्पन्न होती है।
1. सात्त्विक श्रद्धा: यह श्रद्धा पवित्र और सत्त्वपूर्ण होती है। यह श्रद्धा ज्ञान और सच्चाई की ओर ले जाती है और व्यक्ति को उच्च स्तर की साधना और सफलता की दिशा में ले जाती है।
2. राजसिक श्रद्धा: यह श्रद्धा भोग और स्वार्थ की दिशा में होती है। इसमें स्वार्थ और इच्छाशक्ति की प्रधानता रहती है। यह श्रद्धा व्यक्ति को व्यवहारिक और लौकिक चीजों की प्राप्ति की दिशा में ले जाती है।
3. तामसिक श्रद्धा: यह श्रद्धा अज्ञान और अधर्म की दिशा में होती है। इसमें अन्धविश्वास और अज्ञान की प्रधानता रहती है। यह श्रद्धा व्यक्ति को अधर्मिक कार्यों और नाशवादी विचारों की दिशा में ले जाती है।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमारी श्रद्धा हमारे स्वभाव के अनुसार होती है और इसलिए हमें सात्त्विक श्र