अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥14॥
Translation (HI)
अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (कर्ता), करण (इंद्रियाँ), विविध चेष्टाएँ और दैव — ये पाँच कर्म के कारण माने गए हैं।
Life Lesson (HI)
कर्म का परिणाम केवल प्रयास नहीं, भाग्य का भी योग है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि मनुष्य के कर्मों के पीछे पाँच मुख्य कारण होते हैं। इन पाँच कारणों में से पहला है 'अधिष्ठान', जिसका अर्थ है शरीर जिसमें हम कर्म करते हैं। दूसरा कारण है 'कर्ता', जो कर्म करने वाला है। तीसरा कारण है 'करण', जिसमें हमारे इंद्रियाँ शामिल हैं जो हमें कर्म करने में सहायता प्रदान करती हैं। चौथा कारण है 'विविध चेष्टाएँ', जिससे तात्पर्य है कि हमारे भिन्न-भिन्न कर्मों की विविधता। और पाँचवां कारण है 'दैव', जिसे हम भाग्य कह सकते हैं। इन पाँच कारणों के सम्मिलन से ही हमारे कर्म का परिणाम निर्धारित होता है।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सफलता प्राप्त करने के लिए सिर्फ प्रयास में लगना ही काफी नहीं है, बल्कि हमें अपने भाग्य का भी सहारा लेना चाहिए। हमें यह जानकर कर्म करना चाहिए कि हमारे कर्मों का परिणाम केवल हमारे प्रयासों से ही नहीं, बल्कि हमारे भाग्य या दैव से भी निर्भर है। इसलिए हमें सफलता प्राप्त कर