Bhagavad Gita • Chapter 18 • Verse 19

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Chapter 18 • Verse 19

Moksha Sannyasa Yoga

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥19॥
Translation (HI)
ज्ञान, कर्म और कर्ता — ये तीनों गुणों के भेद से भी तीन प्रकार के माने गए हैं; अब मैं तुम्हें वे विस्तार से बताता हूँ।
Life Lesson (HI)
गुणों के प्रभाव से कर्म की प्रकृति भी बदल जाती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गुणों के महत्व के बारे में बता रहे हैं। गुणों का तात्पर्य यहाँ उन गुणों से है जिनसे हर व्यक्ति की प्राकृतिक प्रवृत्ति और कार्यवाही प्रभावित होती है। श्रीकृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि ज्ञान, कर्म और कर्ता तीनों गुणों के भेद से भी तीन प्रकार के माने गए हैं। गुणों के अनुसार ही एक व्यक्ति अपने कार्यों में लगा है और उसका व्यवहार निर्धारित होता है। इसलिए, गुणों के प्रभाव से कर्म की प्रकृति बदल जाती है। इस श्लोक से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि हमें अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति और गुणों को समझना चाहिए ताकि हम सही कार्यों का चयन कर सकें और उनके माध्यम से अपने आत्मविकास में सहायता प्राप्त कर सकें। गुणों के समझने से हम अपने कार्यों को सही दिशा में ले जा सकते हैं और अपने जीवन को समृद्धि और सफलता की दिशा में बढ़ा सकते हैं।