Bhagavad Gita • Chapter 18 • Verse 28

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Chapter 18 • Verse 28

Moksha Sannyasa Yoga

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥28॥
Translation (HI)
जो व्यक्ति असंयमी, जड़ बुद्धि वाला, अभिमानी, कपटी, कर्म त्यागी, आलसी, उदास और टालने वाला हो — वह तामसिक कर्ता कहलाता है।
Life Lesson (HI)
जो काम से भागे, वह जीवन की दिशा नहीं पा सकता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण गुणों के अनुसार तामसिक प्रकृति वाले कर्मयोगी का वर्णन कर रहे हैं। जो व्यक्ति असंयमी, मन्दबुद्धि, अभिमानी, कपटी, कर्म त्यागी, आलसी, उदास और कार्यों को टालने वाला होता है, वह तामसिक कर्ता कहलाता है। इस प्रकार की अवस्था में रहने वाला व्यक्ति कर्मयोग के सिद्धांतों का सही तरीके से अनुसरण नहीं करता और अपने कर्मों में संयम और समर्पण की कमी होती है। इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि एक व्यक्ति को अपने कर्मों में समर्पित और संयमित होना चाहिए। उसको आलस्य और उदासीनता से दूर रहकर सकारात्मक दिशा में अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कर्म करना चाहिए। इसके बिना उसे जीवन में सफलता हासिल करने में कठिनाई हो सकती है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें सकारात्मक और संयमित भावना के साथ कर्म करना चाहिए और आलस्य और उदासीनता की स्थिति से दूर रहकर सफलता की दिशा में अग्रसर होना चाहिए।