शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में न भागना, दान देना और नेतृत्व भाव — ये क्षत्रिय का स्वाभाविक कर्म हैं।
Life Lesson (HI)
धर्म की रक्षा के लिए शक्ति और दया दोनों आवश्यक हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के संदर्भ में क्षत्रियों के विशेष गुणों का वर्णन कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि शौर्य (बहादुरी), तेज (उसकी शक्ति), धैर्य (साहस), दक्षता (कुशलता), युद्ध में न भागना, दान देना और नेतृत्व भाव — ये सभी गुण क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म होते हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि क्षत्रिय वर्ग का कर्तव्य धर्म की रक्षा करना है, और इसके लिए उन्हें शक्ति, साहस और नेतृत्व की गुणवत्ता का संग्रह होना चाहिए। युद्ध में न भागना और दान देना भी क्षत्रिय के स्वाभाविक धर्म हैं। इन गुणों के साथ कार्य करने से क्षत्रिय का कर्म समर्पित और सफल होता है।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति और दया दोनों आवश्यक हैं। यह हमें यह बताता है कि सच्चे क्षत्रिय वह है जो अपनी शक्ति का उपयोग धर्म की रक्षा के लिए करता है और दूसरों की रक्षा के लिए दान करता है। अतः हमें यह सिखाता है कि धर्म की रक्षा में सभी गुणो