सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥48॥
Translation (HI)
हे कौन्तेय! दोषयुक्त भी सहज धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि सभी आरंभ धुएँ से ढके अग्नि के समान दोषयुक्त होते हैं।
Life Lesson (HI)
दोषों के बावजूद अपने धर्म में लगे रहना ही श्रेष्ठ है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि व्यक्ति को दोषों के बावजूद अपने स्वभाविक कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। जैसे कि अग्नि के समान धुएँ से ढके सभी यज्ञ दोषयुक्त होते हैं, उसी प्रकार सभी कर्म भी दोषों से युक्त होते हैं। इसलिए, अपने स्वभाविक कर्मों को करते हुए भी व्यक्ति को उन्हें छोड़कर दूसरे कार्यों में नहीं पड़ना चाहिए।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने कर्मों में निष्ठा और समर्पण बनाए रखना चाहिए, चाहे उनमें दोष हों या न हों। हमें अपने कर्मों को सजीव और सच्चाई से निभाना चाहिए, इससे हमारा मान और समर्थन भी बढ़ता है। इस श्लोक से हमें यह भी समझ मिलता है कि हमें परिस्थितियों में अपने धर्म और कर्म से हार नहीं माननी चाहिए। इससे हम अपनी मानसिकता को मजबूत और स्थिर बना सकते हैं।